संस्कृति, सभ्यता और मर्यादित आचरण का स्तम्भ है रामायण मंचन
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(भारत भूषण)
शारदीय नवरात्र के शुभारम्भ पर जंहा माँ शक्ति की आराधना घर घर मे होती है वही दूसरी ओर मर्यादा पुरुषोत्तम राम का चित्रण असत्य पर सत्य की जीत ओर अंहकार की विनाश की लीला का मंचन हर क्षेत्र में प्रारम्भ होता है।
राम का जीवन समाज के हर वर्ग को सदैव जीवंत बनाये रखने और बुरे समय मे आप कैसे अपने संयम ,धैर्य और अनुशासित जीवन को मर्यादा में रहकर परोपकार की भावना जागृत कर सकते है।इसके लिये राम और उनके परिवार से बड़ा कोई भी नही हो सकता है। दूसरी ओर हर क्षेत्र में महारथ हासिल रावण जिसका देव, दानव ओर यक्ष सहित सम्पूर्ण ब्रह्मांड पर कब्जा था उसके एक अंहकार ने उसका सारा खानदान समूल नाश करवा कर सोने की लंका को खाक में तब्दील कर दिया।लेकिन राक्षस कुल में जन्म लेकर भी विभीषण को राम की शरण प्राप्त हुई और फिर रावण के धाराशाही होने पर उन्हें ही लंका का ताज शुशोभित हुआ।रामायण का हर पात्र कुछ ना कुछ त्याग,तपस्या ओर प्रेणा को देने में सफल रहा है । मातृ भक्त श्रवण कुमार, दशरथ के सारथी सुमन्त, जटायु, शबरी, नल नील, जामवंत, हनुमान, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्नन सहित माता केकई,कौशल्या,सुमित्रा सहित सीता ,उर्मिला, माण्डवी, श्रुति का आदर्श जीवन का वर्णन भविष्य की पीढ़ी को बताने के लिए अपना पुरातन इतिहास कितना महान है वो बहुत कु छ बताने को है।यही वजह है कि आज रामायण का प्रचार प्रसार की बहुत जरूरत समाजिक बुराई को खत्म करने के लिये जरूरी ओर प्रेणाप्रद है।
अपने क्षेत्र मुनि की रेती में 1970 के दशक से पूर्व रामायण का मंचन स्थानीय कलाकारों द्वारा किया जाता रहा है। निर्देशक के रूप में सी एस चौहान, बलदेव प्रसाद कुकरेती, सत्य प्रसाद शर्मा ऐसे महान कलाकार रहे है जिन्होंने अपनी कला से अपना विशेष स्थान बनाया।इनमें से बलदेव प्रसाद कुकरेती ऐसे निर्देशक रहे है जिन्होंने मर्यादा के साथ राम के आदर्श स्वरूप को सदैव बनाये रखा उनके निर्देशन में कोई भी कलाकार नियमो का पालन कर ही भूमिका का निर्वहन करता रहा है।सभी कलाकारों का खाना एक स्थान पर बनना ओर भूमि पर रामायण समापन होने तक शयन करना, हनुमान ध्वज की निरन्तर उपासना का कार्य उनके राम के प्रति प्रेम, आदर्श को दर्शाने को काफी है।उनके द्वारा सहारनपुर, कैलाश गेट, 14 बीघा, तपोवन,पावकी देवी, झेड, आशुतोष नगर आदि क्षेत्रों में रामलीला का मंचन स्थानीय कलाकारों के माध्यम से कराया जाता रहा है।यही नही आज जिस रूप रंग में ये विद्या बढ़नी चाहिए उनमे कमी दिखती है आज पक्के राग, राधेश्याम, बेहरातब्दिल, डायलॉग आदि का बेहतरीन तालमेल अभिनय के साथ साथ अपना अलग सँदेश स्वत दर्शकों को भाता रहा है ।आज डिजिटल क्रान्ति ओर बाहरी चकाचोंध के चलते इनमें कमी आयी है और केवल कलाकार अपने हाव भाव से अपनी कला का प्रदर्शन करते आ रहे है ।वैसे अपना क्षेत्र कलाकारों से भरा पड़ा है ।अनेक स्थानीय कलाकार जिनमे गोपाल शर्मा, विनोद द्विवेदी, धर्मेंद्र कण्डारी, सुशील रतूड़ी लक्ष्मण केअभिनय रावण के अभिनय में सी एस चौहान, बलदेव प्रसाद कुकरेती, अतुल शर्मा, दर्शन लाल हनुमान के जनार्दन प्रसाद कंडवाल, राममूर्ति, श्याम सिंह कण्डारी आदि महिला पात्र के लिए पवन गोदियाल,जगमोहन कण्डारी सहित हास्य कलाकार के रूप में विशम्भर, निक्की की अपनी अगल पहचान रही है।
वर्तमान दो वर्ष से क्षेत्र में माँ गंगा रामलीला समिति रामलीला का मंचन कर रही है किंतु विडम्बना देखिए कि कलाकारों की मंडी में बाहरी आयातित कलाकारों से मंचन किया जाना तर्क संगत नही है। इससे स्थानीय जन की सहभागिता का ना होना और जो सन्देश घर घर पहुँचना चाहिए वो सँदेश का अभाव जरूर खलता है। बस ईच्छा है कि भविष्य में पुराने लोगो को जोड़ते हुए स्थानीय कलाकारों को सम्माहित कर रामलीला का मंचन किया जाय तो इससे सुखद कुछ ओर हो नही सकता है।पुराने समर्पित लोगो को इससे बड़ी कोई श्रद्दांज्जली नही हो सकती है।इसकी आम जनता भी माँग करती है।समिति का कार्य जनहित में है उसकी सफलता की कामना हम भी करते है।
