संघर्ष की लम्बी गाथा लोकगायक विनोद बिजल्वाण की कहानी
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ऋषिकेश, आज उत्तराखण्ड की शान जिसकी कभी ना थी कोई ऊंची पहचान लेकिन अपनी मेहनत ओर उत्तराखण्ड सँस्कृति के लिये साधना पथ पर निकला ये बालक विनोद बिजल्वाण आज नाम का मोहताज नही है।अपनी सरलता, सहजता और मिलनसार स्वभाव से अपनी वाक वाणी से उकेरे शब्द अध्यात्म, लोकसंस्कृति, परम्परा का परचम देश विदेश में डंका बजा रहे है।
मूल रूप से प्रेमानन्द जूनियर हाई स्कूल में अंग्रेजी विषय के शिक्षक के तौर ओर अपनी दशकों से सेवाएं दे रहे विनोद बिजल्वाण अपनी कामयाबी के बल पर प्रधानाचार्य के रूप में अपनी सेवाएं दे है।इसके साथ ही अपनी स्वर साधना के लिये कठोर मेहनत कर कई एलबम्ब उन्होंने जनता को सार्वजनिक की है।घण्टकर्ण देवता सहित माँ जगदम्बा, शिव, कृष्ण आदि की भजनमाला सहित अपने उत्तराखण्ड के मूल जागर सहित विभिन्न सोपानों पर उन्होंने गीत संग्रह कर गाये है।यही नही अपनी उत्तराखण्ड की पहचान विश्व मे अग्रणीय बने उसके लिये वो दिन रात प्रयास कर अनेक प्रयोग कर रहे है। प्रेस क्लब मुनि की रेती एवम गौ , गङ्गा सेवा समिति के होली मिलन समारोह में उन्होंने अपनी स्वरों की जो अवधूत गङ्गा प्रवाहित की उससे आम जन सहित देशी विदेशी भी झूमने को मजबूर हो गया और ये कार्यक्रम अभी भी शोशियल मीडिया में अपनी सुर्खिया बटोर रहा है।
इस कार्यक्रम में एक भेंट में उन्होंने सरकार की ओर से लोकगायकों को कोई प्रोत्साहन ना देने पर नाराजगी जाहिर की।उन्होंने कहा कि प्रदेश में कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम होता है जिसमे उत्तराखण्ड की सँस्कृति, मर्यादा ओर वेशभूषा आदि का परिचय अथितियों को कराया जाना चाहिए उन्हें नजरअंदाज किया जाता है और लाखों, करोड़ो रूपये खर्च कर बाहरी कलाकारों को आमंत्रित कर घटिया पन प्रदशित किया जाना उचित नही है।हमारे पास कलाकारों और नामचीन जो नजीर बन सकते है धरोहर मौजूद है लेकिन सरकार हस्तक्षेप कर सम्मान दे।फिर देखे अपना उत्तराखण्ड किस कदर अपनी सँस्कृति, कला, सभ्यता के परचम विश्व मे फैलाने का कार्य करेगा।उन्होंने कहा अपने स्तर से तो हम काफी प्रयास कर ही रहे है जिसका परिणाम ये गया कि पहाड़ की सँस्कृति आक्सीजन ले कर अपना स्थान बनाने में तत्पर डटी है।
