स्व आसाराम व्यास जी की पुण्य स्मृति: श्रीमद् भागवत कथा का दिव्य समापन
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स्वर्गीय आसाराम व्यास जी की पावन पुण्य स्मृति में आयोजित श्रीमद् भागवत पुराण कथा का विश्राम दिवस केवल एक कथा का अंत नहीं, बल्कि आध्यात्मिकता, श्रद्धा और संस्कारों के एक महाकुंभ का अनंत विस्तार था। कथा के इस अंतिम और अत्यंत भावुक अवसर पर व्यासपीठ से बोलते हुए पूज्य कथा वक्ता आचार्य शिवराम भट्ट जी ने अपनी ओजस्वी और मधुर वाणी से उपस्थित समस्त श्रोता समुदाय को मंत्रमुग्ध कर दिया।
आचार्य जी ने श्रीमद् भागवत के कठिन और गूढ़ दार्शनिक सिद्धांतों को जन-सामान्य के दैनिक जीवन, लोक-व्यवहार और पारिवारिक संस्कृति से जोड़ते हुए अनेकों अद्भुत शास्त्र प्रसंगों की अत्यंत सुंदर और व्यावहारिक व्याख्या की।
कथा के प्रारंभ में आचार्य जी ने स्वर्गीय आसाराम व्यास जी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि जो व्यक्ति अपने जीवन में सत्कर्मों, परोपकार और ईश्वर-निष्ठा की नींव रखते हैं, उनका शरीर भले ही इस नश्वर संसार से विदा हो जाए, किंतु उनकी चेतना उनके परिवार और समाज में सदा जीवित रहती है। स्व. आसाराम व्यास जी की स्मृति में यह भागवत कथा केवल तर्पण नहीं, बल्कि उनकी आत्मा की अनंत यात्रा को गति देने वाला एक पुण्य प्रकाश है। उन्होंने समझाया कि भागवत कथा वह पावन सोपान है जो जीव को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त कर परमात्मा के चरणों से जोड़ती है।
आचार्य शिवराम भट्ट जी ने आगे कहा कि श्रीमद् भागवत पुराण कोई केवल जंगलों में बैठकर संन्यासियों द्वारा पढ़ने का ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह गृहस्थ जीवन को जीने की परिपूर्ण कला सिखाता है। भगवान कृष्ण ने अपने सम्पूर्ण जीवन में गृहस्थ रहते हुए भी धर्म, कर्म और मर्यादा का जो आदर्श प्रस्तुत किया, वही भागवत का सार है। परिवार में आपसी प्रेम, समन्वय, बड़ों का सम्मान और छोटों पर स्नेह—यही सच्चे अर्थों में भागवत का व्यावहारिक आचरण है।
समापन दिवस पर आचार्य जी ने विभिन्न पौराणिक प्रसंगों के माध्यम से जीवन के अनमोल सूत्र साझा किए। सुदामा-कृष्ण मिलन का प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने कहा कि सच्चा मित्र वही है जो बिना किसी अपेक्षा के संकट के समय साथी बने। आज के व्यावहारिक जीवन में हमें अपने रिश्तों में इसी निश्छलता और आत्मीयता की आवश्यकता है। वहीं शुकदेव जी और राजा परीक्षित के संवाद के माध्यम से जीवन की नश्वरता को समझाते हुए आचार्य जी ने कहा कि परीक्षित की तरह यदि मनुष्य अपने जीवन के अंतिम क्षणों तक भगवद् स्मरण में लीन रहे, तो मृत्यु का भय स्वतः समाप्त हो जाता है। भयमुक्त जीवन जीने के लिए मन में भगवान का वास होना अनिवार्य है।
कथा के विश्राम अवसर पर आचार्य जी ने भावुक होकर सभी श्रोताओं से आह्वान किया कि सात दिनों तक आपने अपने कानों से जो भागवत रसपान किया है, उसे केवल कथा पंडाल तक सीमित मत रखिए। इसे अपने आचरण में लाइए, अपने घर-परिवार में प्रेम और सद्भाव की गंगा बहाइए—यही स्व. आसाराम व्यास जी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
यह भव्य श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान, भक्ति और वैराग्य का त्रिवेणी संगम सिद्ध हुई। आचार्य शिवराम भट्ट जी के मुखारविंद से प्रवाहित कथा-सुधा ने उपस्थित सभी भक्तों के अंतःकरण को पवित्र कर दिया। व्यास परिवार द्वारा आयोजित यह अनुष्ठान क्षेत्र के लिए एक प्रेरणास्त्रोत बन गया, जहाँ सद्विचारों और संस्कारों का ऐसा दीप प्रज्वलित हुआ जिसकी रोशनी सदा समाज का मार्गदर्शन करती रहेगी। श्रीमदभागवत ज्ञान यज्ञ मे व्यास परिवार के साथ कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल, नगरपालिका मुनिकिरेती की अध्यक्षा नीलम बिजलवाण, पूर्व अध्यक्ष रोशन रतूड़ी,डाo सुनील दत्त थपलियाल, चन्द्रवीर पोखरियाल, विशाल मणि पैन्यूली, घनश्याम नौटियाल, नरेंद्र मैठानी,रमा बल्लभ भट्ट, धनीराम बिंजोला आदि अनेको भक्तगण उपस्थित थे.
