हिन्दी दिवस एक दिन का अन्वेषण नही बल्कि हर क्षण अटूट आस्था का प्रतीक हर व्यक्ति, हर जाति, हर धर्म को अपनाना जरूरी
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( भारत भूषण कुकरेती एवं सजंय बडोला )
अजीब अपना देश है जँहा आप अनेक मजहब, धर्म, जाति, संस्कृति, परम्परा, भाषा, अनेकता, काले, गोरे आदि आदि के दर्शन कर सकते है अर्थात विश्व से सरोबार हो सकते है। कुल मिलाकर सत्य ,सनातन धर्म की ये भूमि रहस्यमयी ओर प्रेणादायक है लेकिन भाषा का कोष कोष में बदलाव होना आम बात है ।मूल रूप से हिंदी और सँस्कृत यँहा की सँस्कृति में रची बसी होने के बाबजूद भी कुछ अपने ही लोगों को हिंदी भाषा से नफरत होना और अंग्रेजी भाषा को अपनाना , महत्व देना हमे आपस मे भेद करता है जबकि हिन्दी का गौरवशाली आदर्श देश मे स्थापित होना चाहिए। भाषा की अनेकता हमारे जन, जीवन और समृद्दि में बाधक नही एकता के रूप में देखी जानी चाहिए ।वैसे भी हमारी अनेकता में एकता के दर्शन मिलते है। अंग्रेजी भाषा शान नही है बल्कि देश के लिये हिन्दी ज्ञान बहुत जरूरी है। ये बुनियादी प्रश्न है।
अजीब बिडम्बना देखिए अपने देश मे हिंदी दिवस के अवसर पर 14 सितम्बर को कार्यक्रम स्थापित कर हिंदी को जन जन, हर कार्यालय में अपनाने ओर बहुआयामी बनाने को संकल्प लेते जरूर है परन्तु सत्य जो छुपा नही वास्तविकता से देखा परखा जा सकता कि हिन्दी आज भी अपने घर मे सुरक्षित नही , हीन भावना से देखा जाना आदि आदि अनेक सवालों में घिरा हुआ है।आज भी हमारी न्याय व्यवस्था में अंग्रेजी, विद्यालयों में इंग्लिश माध्यम, कार्यालयों में अंग्रेजी की निरन्तर बढ़ती व्यापकता हिंदी पर प्रहार है क्यो नही राज्य ओर केंद्रीय सरकार हिंदी के उत्थान के लिये नीति निर्धारित कर न्याय व्यवस्था, कार्यालयों, राज्य सरकारों, निजी संस्थानों ओर शिक्षा में एकरूपकता लाने का कार्य कर हिंदी को एकदिनी नही हर पल, हर क्षण उसकी महत्ता के लिए करे।सीधी बात हम अंग्रेजी भाषा के कतई विरोधी नही है हम अगर विश्व गुरु बनना है तो अंग्रेजी का ज्ञान ,ध्यान हमे भी होना जरूरी है परन्तु ऐसा कतई नही होना चाहिए कि हम हिंदी को गौण समझकर अंग्रेजी को देश मे महत्व प्रदान करे।मेरा देश जँहा सैकड़ो भाषाएं पढ़ी, बोली जाती है राजस्थान में राजस्थानी, गुजरात मे गुजराती, महाराष्ट्र में मराठी, बिहार में बिहारी, अवधी, यू.पी में हिन्दी , कोंकण, मलयालम , तेलगु , गढ़वाली आदि आदि अनेक भाषा रहस्य यँहा की सँस्कृति, परम्परा में समाया है।
हिंदी साहित्य ओर काव्य का स्वर्णिम गौरवशाली इतिहास इस बात को पुख्ता करता है कि हमारे साहित्य,काव्य से जुड़े विद्धान मनीषियों ने किस अविरल रूप से अमृत वाणी हिंदी को व्यापकता प्रदान की है।और एक हम है जो 14 को हिंदी दिवस मनाकर फिर अंग्रेजी में डूब जाएंगे तो फिर हिंदी कँहा से मजबूत होकर उभरेगी।अभी 14 सितम्बर को आप गौर करे देश के सभी बैंक हिंदी दिवस मनाएंगे ओर आपसे हिंदी अपनाने, बोलने की बात करेंगे फिर आपने बैंक खाते खोलने के लिये आवेदन मांगने का प्रयास किया तो आपको फार्म अंग्रेजी में, न्याय अंग्रेजी या उर्दू में, अधिकारी इंग्लिश में वार्ता कर आपको बताने का प्रयास करेगा जँहा हिंदी को प्रमुख भाषा का दर्जा प्राप्त है।क्या ये हिंदी दिवस मनाने वालो के लिये चिंतनीय नही होना चाहिए।आखिर कौन है जिम्मेदार जो हिंदी को स्वीकार करने को तैयार नही है।इसलिये हिंदी एक दिवसीय उत्सव मनाने से अच्छा ये है कि साल के 365 दिन हिंदी को अपना गौरव मानकर हिंदी बोले, हिंदी में लिखे, कार्यालयों में हिंदी में पत्राचार करे, न्यायालय हिंदी में न्याय लिखे तो फिर हिंदी उत्सव मनाने का प्रश्न नही बल्कि हिंदी विश्व का धर्मगुरु बनकर एक नया आदर्श आयाम स्थापित कर वसुधैव: कुटुम्बकम: बनकर कुशल नेतृत्व बनकर उभरेगी जिस पर आप सब भारतीयों को गर्व होगा और अपना सत्य, सनातन धर्म अपना स्वर्णिम इतिहास की ओर आगे बढ़ेगा।
